बिलासपुर- छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज बिलासपुर के तत्वावधान में वीरांगना महारानी दुर्गावती जी का 462वाँ शौर्य शहादत दिवस अत्यंत गरिमापूर्ण और भव्य रूप से मनाया गया। उसलापुर स्थित गोंड भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में आदिवासी समाज के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी महान पूर्वज को नमन किया।

कार्यक्रम की शुरुआत उसलापुर गोंड भवन परिसर में स्थित बूढ़ादेव ठाना में पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर की गई। इसके पश्चात् समाज द्वारा एक भव्य रैली निकाली गई। यह रैली नगर भ्रमण पर निकली, जिसमें सैकड़ों की संख्या में युवा शक्ति, मातृ शक्ति, पितृ शक्ति और स्थानीय शहरवासी शामिल हुए। रैली के दौरान महारानी दुर्गावती और आदिवासी संस्कृति के जयकारों से पूरा माहौल गूंज उठा।

“प्रमुख चौकों पर हुआ माल्यार्पण”
भ्रमण के दौरान रैली उसलापुर बिरसा मुंडा चौक, रानी दुर्गावती चौक और देवकीनंदन चौक पहुँची। यहाँ समाज के प्रमुखों और युवाओं द्वारा महापुरुषों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

“राजनीतिक मुगलों से बचाना होगा अपना हक-अधिकार”
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज (युवा प्रकोष्ठ) के जिला अध्यक्ष लव सिदार जी ने समाज के सामने आ रही चुनौतियों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं और समाज को जागृत करते हुए कहा हमें अपने हक, अधिकार और ‘जल, जंगल, जमीन’ को आज के इन ‘राजनीतिक मुगलों’ से बचाना होगा। समाज पर हो रहे अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ हमें एकजुट होना पड़ेगा। वक्त आ गया है कि पूरा आदिवासी समाज एक सूत्र में संगठित होकर अपनी ताकत दिखाए।

“कार्यक्रम में ये प्रमुख अतिथि रहे उपस्थित”
इस गौरवमयी अवसर पर समाज के कई वरिष्ठ पदाधिकारी और युवा नेता उपस्थित रहे, जिनमें मुख्य रूप से:
कुंदन सिंह ठाकुर जी (प्रदेश अध्यक्ष, युवा प्रकोष्ठ, छ.ग. सर्व आदिवासी समाज), डॉ. चंद्र शेखर उईके जी
राजेंद्र पोर्ते जी (प्रदेश मीडिया प्रभारी)
पी. एस. पट्टा जी, सियाराम नेताम जी, डॉ. कौशल मरावी जी
ललित ध्रुव जी, जन्तु मरकाम जी, जोगी जी , दिलहरण जी
गौरीशंकर जगत जी, दिलीप ध्रुव जी
शुभम मरावी जी, बंटी ध्रुव जी
मुंगेली जिले से विशेष अतिथि के रूप में युवा राज मुकेश मरावी जी- बब्लू मरकाम जी, हेमराज जी- और संयुक्त सचिव विजय जी- सहित भारी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे।
यह आयोजन बिलासपुर में आदिवासी समाज की एकजुटता, सांस्कृतिक चेतना और अपने अधिकारों के प्रति संकल्प को दर्शाने वाला एक ऐतिहासिक कार्यक्रम रहा।

