बिलासपुर/विद्याडीह – सतनाम बाड़ा, विद्याडीह में 16 अगस्त रविवार को बलिदानी राजा गुरु बालकदास जी का जयंती समारोह अपार श्रद्धा, गरिमा, हर्षोल्लास एवं सामाजिक चेतना के साथ संपन्न हुआ, वैसे तो प्रतिवर्ष 18 अगस्त को गुरु बालकदास जी का जयंती मनाया जाता है लेकिन इस वर्ष सभी समाजजनों की सुविधा एवं अधिकतम सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु इस वर्ष सामूहिक जयंती समारोह दो दिन पूर्व आयोजित किया गया!

‘माता सहोदरा जन कल्याण समिति’ के तत्वावधान में आयोजित इस भव्य समारोह में बड़ी संख्या में समाज के प्रबुद्धजन, युवा, महिलाएँ एवं गणमान्य नागरिक शामिल हुए।
कार्यक्रम का शुभारंभ गुरु बालकदास जी के तैलचित्र पर माल्यार्पण, पूजा-अर्चना एवं मंगलाचरण के साथ हुआ। तत्पश्चात उपस्थित वक्ताओं ने गुरु बालकदास जी के जीवन, स्वाभिमान, सामाजिक क्रांति एवं अधिकार-सम्मान की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदान पर विस्तृत प्रकाश डाला।
“शिक्षा, एकता और नशामुक्ति पर रहा विशेष जोर”
समारोह के दौरान मुख्य वक्ता डॉ. दुर्गा प्रसाद मेरसा, टेकचंद पंडाल, हरीश पंडाल, मन्नू कुर्रे एवं भारती सर ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि महापुरुषों की जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उनके आदर्शों पर चलकर समाज को दिशा देने का अवसर है। उन्होंने समाज में शिक्षा को प्राथमिक लक्ष्य बनाने, युवाओं को नशे की सामाजिक बुराई से दूर रखने तथा अपने संवैधानिक अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहने का पुरजोर आह्वान किया।

कार्यक्रम में पहुंचे गणमान्य अतिथियों ने राजा गुरु बालकदास जी के संघर्षपूर्ण जीवन पर प्रकाश डाला और बताया कि कैसे उन्होंने सत्य के मार्ग पर चलकर जन-जन के दिलों में राज किया और ‘राजा’ कहलाए।
“गुरु घासीदास से गुरु बालकदास तक – सतनाम की ज्योति”
बाबा गुरु घासीदास जी ने सत्य, अहिंसा और समता के विचार से जिस सतनाम पंथ की नींव रखी, उस ज्योति को आगे बढ़ाने का काम उनके सुपुत्र गुरु बालकदास जी ने किया। उन्होंने समाज में फैले भेदभाव और कुरीतियों को मिटाकर शोषितों और पीड़ितों में स्वाभिमान का संचार किया।
“अंग्रेजों ने भी झुककर दी ‘राजा’ की उपाधि”
अतिथियों ने बताया कि गुरु बालकदास जी का जनाधार और समाज सुधार के प्रति उनका बल इतना अभूतपूर्व था कि तत्कालीन अंग्रेज शासन को भी उनके सामने झुकना पड़ा और उन्हें ‘राजा’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। यह उपाधि किसी सत्ता से नहीं, बल्कि जनकल्याण और जनता के असीम प्रेम का प्रतीक थी।
“सम्मान और अधिकार की रक्षा में शहादत”
राजा गुरु बालकदास जी का संपूर्ण जीवन सामाजिक समरसता और मानव अधिकारों की रक्षा को समर्पित रहा। शोषित वर्ग को उनका हक और सम्मान दिलाने के मार्ग में वे कभी पीछे नहीं हटे और इसी संघर्ष में उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी यह शहादत आज भी सतनाम पंथ और पूरे समाज को सत्य की राह पर चलने की प्रेरणा देती है।

“राजा गुरु बालकदास जी ने सिखाया कि सत्य के मार्ग से कभी डिगना नहीं चाहिए। उन्होंने अधिकार और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जो बलिदान दिया, वह युगों-युगों तक अमर रहेगा।”
जयंती समारोह में उमड़े जनसैलाब ने यह साबित कर दिया कि राजा गुरु बालकदास जी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। सतनाम की यह ज्योति समाज में समरसता और न्याय की राह सदा आलोकित करती रहेगी।

”मंच संचालन एवं आभार प्रदर्शन”
कार्यक्रम का प्रभावशाली मंच संचालन विजय हिरवानी द्वारा किया गया। उन्होंने क्रमबद्ध रूप से गुरु बालकदास जी के जीवन प्रसंगों और विचारों को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के संचालक बसंत जांगड़े ने उपस्थित सभी अतिथियों, माताओं-बहनों एवं युवाओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा — “महापुरुषों की केवल तस्वीर लगाने से नहीं, बल्कि उनके विचारों को अपने दैनिक जीवन में उतारने से समाज महान बनता है। गुरु बालकदास जी का स्वाभिमान और जनकल्याण का संदेश ही हमारी असली पहचान है।”
कार्यक्रम का समापन पूरे परिसर में गूंजते ‘जय सतनाम’ और ‘जय गुरु बालकदास’ के जयघोषों तथा शिक्षित, संगठित एवं स्वाभिमानी समाज के निर्माण के संकल्प के साथ हुआ।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में चंद्रिका घृतलहरे जी, बिहारी कोशले जी, चौवन गेंदल जी, दिलहरन गंगीले जी, मंहगू अंचल जी, बुधेलाल जी, भोंदू जी, झाल से सुखदास पंडित जी , कनेरी डॉ जीवन लाल जी, सुंदर लाल एवं महिलाओं में रामकली जी, श्यामकली जी , रागिनी जी एवं कुटेला के महिला समूहों का सहयोग रहा, इस दौरान बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे!

