बिलासपुर- किसान परिवार के साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर छत्तीसगढ़ की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने वाले उप मुख्यमंत्री अरुण साव का सफर केवल राजनीतिक पदों की कहानी नहीं, बल्कि संगठन, जनसेवा और संघर्ष की मिसाल है। बिलासपुर प्रेस क्लब के पारंपरिक कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में उन्होंने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं को साझा किया है।

मुंगेली जिले के लोहरिया गांव में बीता अरुण साव का बचपन खेत-खलिहान, तालाब और पारंपरिक खेलों के बीच बीता। गिल्ली-डंडा और भौंरा उनके पसंदीदा खेल थे। उनके पिता वकील होने के साथ गांव के सरपंच भी रहे, जिससे घर में सामाजिक-राजनीतिक माहौल मिला। चौथी कक्षा से मुंगेली में पढ़ाई के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखा में जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया, जिसने उनके व्यक्तित्व की मजबूत नींव रखी।

कॉलेज के दिनों से ही नेतृत्व क्षमता दिखाने वाले अरुण साव ने साल 1990 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की मुंगेली इकाई की कमान संभाली। इसके बाद वे प्रांत सहमंत्री से लेकर राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य तक रहे।

वकालत के पेशे से जुड़ने के बाद उन्होंने न्यायिक क्षेत्र में उप महाधिवक्ता जैसी जिम्मेदारियां भी निभाईं। साल 2019 में लोकसभा सांसद, 2022 में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और फिर 2023 में लोरमी से विधायक चुनकर उप मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।
राजनीति के साथ-साथ समाजसेवा में भी उनका योगदान शुरू से ही सक्रिय रहा है। साल 1996 में जब समाज में रक्तदान को लेकर भारी संकोच और भय था, तब उन्होंने मुंगेली में 500 लोगों के रक्त समूह परीक्षण का शिविर आयोजित कराया। रक्तदाताओं की डायरेक्ट्री तैयार कर डॉक्टरों तक पहुंचाई ताकि जरूरतमंदों की मदद हो सके। इसके अलावा नेत्र शिविरों में व्यवस्था संभालना और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार में सहयोग करना उनके सेवाभाव को दर्शाता है।

