बिलासपुर रेल हादसे में ग्राम ढेंका के सोनू बघेल (पिता बैसाखू बघेल) और उनके साँथी कमलेश पात्रे,सुशील कुमार गेंदले,जितेंद्र गेंदले, विलाश पात्रे ने साहसिक कदम उठाते हुए कई घायलों की जान बचाई। दो साल के बच्चे को बचाने की कोशिश भी की। प्रशासन के पहुंचने से पहले ये बने हादसे के असली हीरो।
हादसे के दौरान ग्राम ढेंका के युवाओं ने जो साहस और मानवता दिखाई, वह पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है।
“हादसे के तुरंत बाद पहुंचे ग्रामीण”
इन सभी युवाओं ने ट्रेन के डिरेल होते ही दूर से घटना देख ली थी। वे बिना देर किए मौके पर पहुंचे और घायलों की मदद शुरू कर दी। ट्रेन के डिब्बे क्षतिग्रस्त हो चुके थे, यात्री अंदर फंसे थे और चीख-पुकार मची हुई थी। इस स्थिति में सोनू बघेल और उनके साथियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना यात्रियों को बाहर निकालना शुरू किया। जिनकी हालत गंभीर थी, उन्हें वाहनों से अस्पताल भेजा गया।
“मासूम बच्चे को बचाने की कोशिश”
राहत कार्य के दौरान उन्हें दो साल के मासूम बच्चा मिला जो मलबे में फंसा हुआ था। बच्चे के पेट में लोहे का बड़ा टुकड़ा धंसा हुआ था। सोनू बघेल और उनके दोस्तों ने मिलकर उसे बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन बिना उपकरणों के यह संभव नहीं हो पाया। बाद में जब बचाव दल मौके पर पहुंचा, तो उन्होंने बच्चे को बाहर निकाला, पर उसकी स्थिति बेहद नाजुक थी।
“सोशल मीडिया बना मदद का जरिया”
घायलों की पहचान और उनके परिजनों तक जानकारी पहुँचाने के लिए इन युवाओं ने मोबाइल से फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए। उनकी इस कोशिश से कई परिवारों को अपने परिजनों की जानकारी मिली और अस्पतालों में उपचार के लिए मदद भी तेजी से पहुंची।

“रियल हीरो” कहे गए ग्राम ढेंका के युवा”
रेलवे और प्रशासनिक टीम को घटनास्थल तक पहुँचने में समय लगा, लेकिन तब तक सोनू बघेल ,कमलेश पात्रे, सुशील कुमार गेंदले, जितेन गेंदले, विलाश पात्रे ने मिलकर कई जिंदगियां बचा लीं।

स्थानीय लोगों ने इन सभी युवाओं के साहस की जमकर सराहना की है।
ग्राम ढेंका के ये पांचो साथी मंगलवार को हुए बिलासपुर रेल हादसे के “असली हीरो” बन गए हैं — जिन्होंने विपत्ति की घड़ी में निस्वार्थ भाव से मानवता की सच्ची मिसाल पेश की है।
रेल प्रशासन और राज्य सरकार को इन युवाओं का धन्यवाद करना चाहिए जिन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर घायलों का रेस्क्यू किया।

