बिलासपुर- 17 मई 2026 को सतनाम बाड़ा विद्याडीह में माता सहोदरा जन कल्याण समिति के तत्वावधान में “सशक्त महिला – सशक्त समाज” विषय पर एक अति महत्वपूर्ण और वैचारिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में समाज के प्रबुद्ध जनों, विचारकों और महिलाओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान नारी सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता, अधिकार और सुरक्षा जैसे गंभीर बिंदुओं पर खुलकर चर्चा हुई और यह स्वीकारा गया कि समाज की मजबूती पूरी तरह महिलाओं की आत्मनिर्भरता पर निर्भर है।

“कार्यक्रम की शुरुआत और सांस्कृतिक रंग”
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और संगीतमय गुरु वंदना के साथ हुई। सतनाम बाड़ा के संचालक गुरुजी बसंत जांगड़े ने बाड़ा का संक्षिप्त इतिहास और अब तक किए गए सामाजिक प्रयासों की जानकारी साझा की। इसके बाद यामिनी गांगीले, सोनम घृतलहरे, योगी मधुकर, प्राची गेंदले, युवराज घृतलहरे और भाग्यलक्ष्मी सहित नन्हे-मुन्ने बच्चों ने विषय पर अपनी बेहद संक्षिप्त और सारगर्भित प्रस्तुतियां दीं।

“रूढ़िवादिता की बेड़ियों को तोड़ने का आह्वान”
कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने समाज में व्याप्त रूढ़िवादी विचारधारा, अंधविश्वास और परंपरागत मान्यताओं की कड़े शब्दों में आलोचना की। महिला वक्ताओं ने कहा जब तक महिलाएं सामाजिक गुलामी की इन जंजीरों को पहचान कर उन्हें तोड़ने के लिए सक्षम नहीं होंगी, तब तक वे आगे नहीं बढ़ पाएँगी। महिलाओं के पिछड़े रहने से समाज और राष्ट्र का विकास अधूरा रह जाएगा।

“गद्दी पूजा नहीं, शासक बनने की सोच विकसित करें”
इस वैचारिक मंच से गुरु घासीदास बाबा के मूल विचारों को अपनाने पर ज़ोर दिया गया। वक्ताओं ने समाज में नवीन रूढ़िवादी धारणाओं को मजबूत करने वाले तत्वों की निंदा की। उन्होंने कहा कि गुरु घासीदास जी ने हमेशा मूर्ति पूजा का विरोध किया था, लेकिन आज समाज उनके विचारों से दूर जा रहा है।
कार्यक्रम में गद्दी पूजा की आलोचना करते हुए प्रबुद्ध जनों ने कहा हमें सिर्फ गद्दी की पूजा नहीं करनी है, बल्कि गद्दी पर बैठने लायक यानी ‘शासन करती जमात’ बनना है। जिस तरह गुरु घासीदास जी ने अपने द्वितीय पुत्र गुरु बालक दास जी को राजा बनाकर समाज का नेतृत्व सौंपा था, आज हमारे लोगों को भी वैसी ही शासन करने वाली सोच विकसित करनी होगी।

“महापुरुषों और वीरांगनाओं का स्मरण”
सशक्त महिला सशक्त समाज के संकल्प के साथ वक्ताओं ने गुरुपुत्री माता सोदरा, सुंदरी माता, और ममतामयी मिनी माता जी के योगदान को याद किया। साथ ही, राष्ट्र निर्माण और महिला उत्थान में माता रमाबाई और क्रांतिज्योति माता सावित्रीबाई फुले के संघर्षों को याद करते हुए साझा किया कि जब-जब महिलाओं ने नेतृत्व संभाला है, समाज में आमूल-चूल (क्रांतिकारी) परिवर्तन आया है।
“बदलते युग में AI और संस्कारी शिक्षण की ज़रूरत”
आज के तेजी से बदलते शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार के स्वरूप पर चर्चा करते हुए प्रबुद्ध जनों ने युवाओं और आने वाली पीढ़ी की स्थिति पर चिंता व्यक्त की।
वक्ताओं ने कहा कि आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का युग है, लेकिन युवा पीढ़ी इस तकनीक का सही और बेहतर इस्तेमाल नहीं कर पा रही है, जो भविष्य के लिए बड़ा खतरा है।
बच्चों को आज के दौर के अनुरूप’संस्कारी शिक्षण’ (Cultured Education) देने और युवाओं को एआई (AI) को समझकर समाज का नेतृत्व करने के लायक बनने पर बल दिया गया।

“जातिवाद मुक्त राष्ट्र निर्माण का संकल्प”
प्रबुद्ध जनों ने जातिगत घमंड और इसे बढ़ावा देने वाली हरकतों को समाज के लिए एक लाइलाज बीमारी बताया। उन्होंने कहा कि जातिवाद ने हमेशा श्रेणीगत विषमता और असमानता को जन्म दिया है। सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना में जाति ही सबसे बड़ी बाधा है, जो एक राष्ट्र को वास्तविक राष्ट्र बनने से रोकती है। इस रोग से मुक्त होकर राष्ट्र निर्माण करना हम सबका पहला कर्तव्य होना चाहिए।
मंच का सफल संचालन धीमंत विजय कुमार हिरवानी द्वारा किया गया। वक्ताओं के रूप में धीमंत प्रदीप बंजारे सर, गुरुजी मन्नू कुर्रे, डॉ. दुर्गा प्रसाद मेरसा, धीमंत हरीश पंडाल, धीमंत टेकचंद पंडाल, मालिक राम घृतलहरे, धीमंत रजनी कोसले और धीमंत रामकली अंचल ने अपनी बातें गंभीरता से रखीं। वहीं बिहारीलाल कोसले जी ने अपनी शानदार कविता पाठ से समां बांध दिया।
इस अवसर पर सुंदरलाल, डॉ. जीवन लाल, जीवनलाल लहरे, चौवन गेंदले, चंद्रिका प्रसाद, गोफेलाल, मालिकराम, गया राम, तुलसीराम, सुखदास पंडित और सोखीलाल पंडित उपस्थित रहे। कार्यक्रम में शामिल अतिथियों के भोजन निर्माण में संचालिका कुसुमलता जांगड़े, श्यामप्यारी और स्थानीय महिला समूहों का विशेष व सराहनीय योगदान रहा।

कार्यक्रम के अंत में पंडित दिलहरण गांगिले द्वारा सभी का आभार व्यक्त किया गया और उपस्थित जनसमुदाय को स्वरुचि भोज के लिए आमंत्रित किया गया। कार्यक्रम का समापन क्रांतिज्योति माता सावित्रीबाई फुले के इस क्रांतिकारी संदेश के संकल्प के साथ हुआ जागिये, उठिए, शिक्षित बनिए, परंपरा को कुचलकर मुक्त हो जाइए। वहाँ मौजूद सभी महिलाओं और प्रबुद्ध जनों ने एक स्वर में इस संदेश पर आगे बढ़ने की सहमति जताई।

